रविवार, 9 जुलाई 2017

गुम है मेघा , रूठी है वर्षा !

ग़ुम हो गए हैं कहां  मेघा , कहां रूठ चली गयी है वर्षा ।
इंतज़ार मैं आँखे सूखी ,  कैसे मिटे तन मन की तृष्णा ।
है नीर बिना ताल सूखा , ना कल कल करे  सरिता ।
ताप्ती हुई है ये धरती,  बिन पानी है सब तरसना ।
है खेतों ने  खोई रौनक , बिलकुल भी चले बस ना ।
उदासी में गुम है प्रकृति , कैसे दुनिया में  गढ़े नई रचना ।
है सबकी यही तमन्ना , सब हिलमिल करे उपासना ।
ऐसा हो दीप करिश्मा,  आकर काले मेघा  लगे बरसना ।

2 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

बरसेंगे जरूर एक दिन
बहुत सही

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

कविता मेम , आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद ।